ऐ शहर !
मैं आ रहा हूं
तेरे पास
गाँव छोड़कर
नये अनुभवों के साथ
जैसे जरई जा बैठती है
दुसरे खेत में
इस आशा के साथ
कि एक दिन बन जाएगी पौध
लगेंगी जिस पर बालियां
जिन्हे देख खिल उठेंगे किसान।
जरई से धान होना
मैं जानता हूं
विकास की एक प्रक्रिया है
झेलना पड़ता है जिसमें वर्षा और धूप
ऐसे अंदेशे भी कि
मिट्टी कैसी होगी
मिल पाएगा उसे किसान
दे पाएगा खाद पानी
या सूखे की बलि चढ़ जाना होगा !
हाँ, यह भी पता कर लिया है मैंने
कि आरामगाह छोड़े बिना
संभव नहीं है विकास।
मैं आ रहा हूं
तेरे पास
गाँव छोड़कर
नये अनुभवों के साथ
जैसे जरई जा बैठती है
दुसरे खेत में
इस आशा के साथ
कि एक दिन बन जाएगी पौध
लगेंगी जिस पर बालियां
जिन्हे देख खिल उठेंगे किसान।
जरई से धान होना
मैं जानता हूं
विकास की एक प्रक्रिया है
झेलना पड़ता है जिसमें वर्षा और धूप
ऐसे अंदेशे भी कि
मिट्टी कैसी होगी
मिल पाएगा उसे किसान
दे पाएगा खाद पानी
या सूखे की बलि चढ़ जाना होगा !
हाँ, यह भी पता कर लिया है मैंने
कि आरामगाह छोड़े बिना
संभव नहीं है विकास।
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