Saturday, November 25, 2017

कविता~ ऑमलेट

        आमलेट

बचपन से सुनता आया हूँ,

धरती है,

अंडे के जैसी गोल,

आज पता चला,

हमारे रोज का हासिल भी,

अंडा है,

उठनाब्रश करना,

नहानाआफिस जाना,

थकनाखाना और सो जाना,

हर दिन वही क्रम दोहराना,

जैसे सिसाइफस का,

पत्थर लेकर,

ऊपर जाना- नीचे आना,

असल मुश्किल तो ये है कि,

अभी आया नही मुझे,

आमलेट बनाना.......

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